करता है उन्मुक्त हास मन, मेरी श्रद्धा ही मेरी आस।। बनकर जीवन एक मृदु पवन, दे जाये मधु आभास।।मेरा आस -पुंज प्रज्वलित, बनकर तम का दृढ़ सहारा।। यह तो प्रेरणा जीवन की, है जीवन का मधुर किनारा।।

ज्ञान

तुम जब कभी आकर देखोगे,

वही मकान और आँगन द्वार
सब कुछ अपरिवर्तित होगा...सिवा तुम्हारे,
क्योंकि तब तुम अपरिचित पथिक होगे,
जो न जाने कौन से देश से है?
क्यों आया और कब जाएगा?
रुकेगा क्यों?
यात्री ...यायावर की तरह फिर किसी देश
और उसके किसी सूने से आँगन द्वार...
आँखे पथराई नहीं होंगी
प्रतीक्षा में तुम्हारे लिए।
हाँ..
पर एकटक आश्चर्य से घूरती ज़रूर रहेंगी...
इन्हें क्या पता?
इस पथिक की पहचान और इसकी मंशा... 
शायद तुम्हारे प्रति करुणा का भाव भी रखेंगी।।कुछ रहस्य और कुछ विद्रोहात्मक भी।।
तुम पढ़ ना सको...
भले ही महाज्ञानी हो
तत्व,मीमांसा और ज्ञान से खंडित कर दो अहंकार 
पर यहां तुम निरुत्तर और अपराधी की भांति निश्चिन्त खड़े होंगे।
तुम्हारी आँखें तीक्ष्ण भी नहीं होंगी 
भाग कर भी भाग नहीं सकोगे।।
क्योंकि पांव तुम्हारा साथ छोड़ देंगे....
उसी कठोरता से,
जैसे तुमने यहां कभी सब छोड़ा था।
आज कोई रोकेगा नहीं
पर तुम भाग नहीं पाओगे
तुम्हारी सारी क्षमताएं टूट जाएँगी
और तब तुम समझोगे कि
बुद्ध बनना आसान है
बंधन से मुक्ति आसान है
संसार  का त्याग करना कोई मुश्किल नहीं
परम की प्राप्ति भी
और इस आँगन और द्वार को जीवंन्त रखना
किसी की प्रतीक्षा में,
वर्षो से....उम्मीद के सहारे
जिसके आने का कोई विश्वास नहीं,
फिर भी
अपने मन को सांत्वना देते हुए
सत्य है कि बहुत बड़ा तप है
युगों तक चलने वाला 
जिसके बाद ना तो सिद्धि की आस है
ना प्रसाद का विश्वास
बस ये मन है
जो स्वयं बंधन में जकड़ा है
और स्वतः ही अपने आप उसमे मिल जाएगा
इसको नहीं है किसी ज्ञान की आवश्यकता
किसी माध्यम मार्ग की
क्योंकि ये बुद्ध नहीं है.....।







About author
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डॉ. मंजू थापा

स्वतंत्र रचनाकार,कई पत्र पत्रिकाओं में लेख और कविताएं प्रकाशित। निरंतर रचनात्मक लेखन की राह में समर्पित।। 

ब्लाॅग का उद्देश्य रचनात्मक चिंतन एवं मनोभावों को नई दिशा एवं प्रेरणा मिले,जिससे लेखन प्रभावी और सारगर्भित हो।।