करता है उन्मुक्त हास मन, मेरी श्रद्धा ही मेरी आस।। बनकर जीवन एक मृदु पवन, दे जाये मधु आभास।।मेरा आस -पुंज प्रज्वलित, बनकर तम का दृढ़ सहारा।। यह तो प्रेरणा जीवन की, है जीवन का मधुर किनारा।।

 नारी

बीती हुई कहानी की,

एक विशेष पात्र हो तुम।
उलझी हुई पहेली की,
कोई कड़ी मात्र हो तुम।
इसीलिए तुम्हारे बिना,
प्रज्ञा स्थिर हो जाती है।
जागी हुई भाग्य रेखा,
पल भर में सो जाती है।
फिर भी तुम स्वयं को, 
क्यों उपेक्षित करती हो।
संसार भर में दया की,
याचना प्रेषित करती हो।
नारी हो अभिमानी हो,
अशक्त नहीं सशक्त हो।
जीवन की दिशा मोड़ दे 
जो, तुम्ही ऐसा वक़्त हो।









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डॉ. मंजू थापा

स्वतंत्र रचनाकार,कई पत्र पत्रिकाओं में लेख और कविताएं प्रकाशित। निरंतर रचनात्मक लेखन की राह में समर्पित।। 

ब्लाॅग का उद्देश्य रचनात्मक चिंतन एवं मनोभावों को नई दिशा एवं प्रेरणा मिले,जिससे लेखन प्रभावी और सारगर्भित हो।।