करता है उन्मुक्त हास मन, मेरी श्रद्धा ही मेरी आस।। बनकर जीवन एक मृदु पवन, दे जाये मधु आभास।।मेरा आस -पुंज प्रज्वलित, बनकर तम का दृढ़ सहारा।। यह तो प्रेरणा जीवन की, है जीवन का मधुर किनारा।।

नव वर्ष

अभिनन्दन करती हूँ मैं

नव चेतना नव हर्ष  का।
स्वागत, आज क्षिति पर
आगमन है नव वर्ष का।।

हुई चिर प्रतीक्षा समाप्त
आ गयी ये  मधुर बेला।
नयी उम्मीद  व  आशा
का सजने  लगा मेला।।

धुंध सी है हटने लगी
लक्ष्य स्पष्ट सामने है।
इस प्रतीक्षित समय के
मन में कई सपने  है।।

स्वागत करती है ऋतु
उत्सुकता से आने का।
सजता उमंगों का मेला
जीवन में सब पाने का।।

आओ नवचेतना के युग
प्रतीक्षा करे नयन अधीर।
आकर इस तन मन में
भर दो उज्जवल धीर।।





About author
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डॉ. मंजू थापा

स्वतंत्र रचनाकार,कई पत्र पत्रिकाओं में लेख और कविताएं प्रकाशित। निरंतर रचनात्मक लेखन की राह में समर्पित।। 

ब्लाॅग का उद्देश्य रचनात्मक चिंतन एवं मनोभावों को नई दिशा एवं प्रेरणा मिले,जिससे लेखन प्रभावी और सारगर्भित हो।।